
कादर खान:ऺविजय दीनानाथ चौहान पूरा नाम, बाप का नाम दीनानाथ चौहान,उम्र 36 साल नौ महिने और ये सोलहवां घंटा चालू है… ऺ फिल्म अग्निपथ का यह संवाद अब अमिताभ बच्चन की पहचान है. ‘जंजीर’ से उनके विजय बनने का जो सिलसिला शुरू होता है वह अपना सबसे ऊंचा मुकाम यहीं पर आकर जोर पकड़ता है. इस लोकप्रिय डायलॉग के इंजिनियर थे एक्टर-कॉमेडियन-लेखक कादर खान. जिन्होंने सत्तर-अस्सी के दशक में ‘मिस्टर नटवरलाल’ और ‘सत्ते पे सत्ता’ जैसी कई फिल्मों में दमदार संवाद लिखकर अमिताभ बच्चन को वजनदार बनाए रखा और उनके सदी का महानायक बनने में एक बड़ी भूमिका निभाई.
कादर खान का जन्म देश की आज़ादी से 10 साल पहले यानी 22 अक्टूबर 1937 में हुआ था. उन्होंने अफगान पिता अब्दुल रहमान खान और हिंदुस्तानी मां इकबाल बेगम के बेटे के रूप में काबुल में जन्म लिया था. बाद में मुंबई के एक म्युनिसिपल स्कूल से पढ़ाई करने वाले कादर खान ने यहीं के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक इस्माइल युसुफ कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग में मास्टर्स डिप्लोमा हासिल किया. अपने दौर में कादर खान भी फिल्म संवादों की इंजीनियरिंग बदल कर यह काम कर चुके हैं.
कादर खान का विकीपीडिया पेज बताता है कि दिलीप कुमार ने उन्हें कॉलेज के एक कार्यक्रम में परफॉर्म करते देखा और ‘जवानी दीवानी’ की पटकथा लिखने का ऑफर दे डाला. इस तरह साल 1972 में बतौर फिल्म लेखक उनका करियर शुरू हुआ. इसके बाद संवाद लेखन का पहला मौका उन्हें बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना ने ‘रोटी’ में दिलवाया. मनमोहन देसाई निर्देशित ‘रोटी’ के लिए उन्हें उस जमाने में एक लाख इक्कीस हजार रुपए मिले थे. यह उस समय महज दो साल पुराने एक लेखक के हिसाब से बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. इसके बाद आने वाले सालों में वह वक्त भी आया जब मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा जैसे विरोधी खेमों के लिए उन्होंने एक ही वक्त में फिल्में लिखीं.

बतौर लेखक चार दशक लंबे अपने करियर में कादर खान ने करीब 250 से ज्यादा फिल्मों के संवाद लिखे. इसमें अमिताभ बच्चन और गोविंदा की कई हिट फिल्मों के अलावा ‘हिम्मतवाला,’ ‘आतिश,’ ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी,’ ‘खून भरी मांग,’ ‘कर्मा,’ ‘सरफरोश’ और ‘धर्मवीर’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं. इन फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्होंने बॉलीवुड को कई आइकॉनिक किरदार दिए और कादर खान ने उन्हें जुबान दी. इसके लिए साल 1982 और 1993 में कादर खान को फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया. साल 2013 में फिल्मों में उनके योगदान के लिए साहित्य शिरोमणि सम्मान से भी उन्हें सम्मानित किया गया.

कादर खान को फिल्म संवादों की इंजीनियरिंग बदलने वाला इंजीनियर-लेखक इसलिए भी कहा जा सकता है कि उस दौर की गुंडा-गैंगस्टर फिल्मों में बम्बइया जुबान का इस्तेमाल करने का चलन उन्होंने ही शुरू किया. बाद में यह भाषा इतनी लोकप्रिय हुई कि हिंदी फिल्मों की भाषा बन गई. हालांकि कई बार दोअर्थी होने के लिए इसकी आलोचना भी की गई. लेकिन, अपने हल्के-फुल्केपन के कारण इसे पसंद भी खूब किया गया.
नई पीढ़ी कादर खान को अमिताभ बच्चन या गोविंदा जैसे सितारों को स्थापित करने वाले लेखक से ज्यादा एक कॉमेडियन के तौर पर जानती है. उनके लिए वे एक ऐसे अभिनेता थे जो गोविंदा की ‘नंबर-वन’ सीरीज की फिल्मों में उनके या करिश्मा कपूर के पिता बनते थे. इन फिल्मों में पूरे तीन घंटे हंसा-हंसाकर खिझा देने वाला उनका किरदार क्लाइमैक्स में हीरो-हीरोइन के प्यार को स्वीकार कर लेता था और हैप्पी एंडिंग.

Author: sanvaadsarthi
संपादक